वैदिक संस्कृति में यज्ञ – एक समग्र जीवन दर्शन एवं साधना पथ
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Keywords

यज्ञ
वैदिक संस्कृति
समग्र जीवन दर्शन
साधना पथ
व्यक्तित्व रुपाँतरण।

How to Cite

Singh, S. (2019). वैदिक संस्कृति में यज्ञ – एक समग्र जीवन दर्शन एवं साधना पथ. Interdisciplinary Journal of Yagya Research, 2(2), 01-06. https://doi.org/10.36018/ijyr.v2i2.45

Abstract

यज्ञ भारतीय संस्कृति का आदि प्रतीक है। हमारे धर्म में जितनी महानता यज्ञ को दी गई है, उतनी और किसी को नहीं दी गयी है। जीवन का कोई भी कर्म हो, शायद ही यज्ञ के बिना पूर्ण माना जाता हो। जन्म से पूर्व से लेकर मरण पर्यन्त सम्पन्न होने वाले संस्कार यज्ञ के माध्यम से ही सम्पन्न होते हैं। यज्ञ के चिकित्सकीय गुण एवं वातावरण शुद्धि के लाभ सर्वविदित हैं। यज्ञ से कामना सिद्धि के अनगिन उदाहरण शास्त्रों में भरे पड़े हैं। इन सबके साथ यज्ञ में जो प्रेरणा प्रवाह निहित है, साधना का समग्र विधान विद्यमान है, वह स्वयं में विलक्ष्ण है। यज्ञ में निहित जीवन दर्शन व्यक्ति, परिवार, समाज- संस्कृति, प्रकृति-पर्य़ावरण, सकल सृष्टि एवं ब्रह्माण्ड को स्वयं में समेटे हुए है। इसमें भौतिक विकास-आध्यात्मिक उन्नयन, इहलोक-परलोक, विज्ञान-अध्यात्म जीवन के दोनों विरोधी ध्रुब अपनी समग्रता में गुंथे हुए मिलते हैं, जो यज्ञ के दर्शन की विशिष्टता है। साथ ही इसमें जीवन साधना का वह पथ निर्दिष्ट है, जो व्यक्ति को जहाँ खड़ा है, वहीं से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है और व्यक्तित्व के मर्म को स्पर्श करते हुए, उसके रुपाँतरण के साथ चरम लक्ष्य की ओर अग्रसर करता है और व्यक्ति के उत्कर्ष के साथ समष्टि के कल्याण को सुनिश्चित करता है। वर्तमान शोध पत्र में यज्ञ से जुड़े इन्हीं पक्षों को प्रकाशित करने का प्रय़ास है, जिसमें इसके समग्र जीवन दर्शन एवं साधना पथ को स्पष्ट किया जा रहा है।

https://doi.org/10.36018/ijyr.v2i2.45
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